Wednesday, 29 April 2015

कब तक यूँ ही


वह जानता था सामने वाले की ताकत,
भीतर ही भीतर डरता भी था,
बहुत उससे,
पर क्या करता आखिर वह ?
कब तक यूँ ही डरता हुआ,
जीने को मजबूर रहता वह।
आखिर,एक दिन असह्य हो गया,
उस दमन-चक्र को और सहन करना।
पता नहीं,कहाँ से आ गयी थी,
उस दिन इतनी ताकत उसमें,
अंज़ाम की परवाह किए बिना उसने,
पकड़ ली थी, 
उस ताकतवर की गिरेबान,
बिना यह सोचे कि उसके एक हाथ ज़माने पर,
वह पानी माँगने के लिए भी,
नहीं उठ पाएगा।
उसके एक फोन कर देने पर,
उस पर कोई भी आरोप लगा,
एक पल में अंदर कर दिया जाएगा।
नहीं थी आज उसे किसी भी,
परिणाम की चिंता,
हाँ यदि कुछ था,
तो वह था स्वयं के,
जीवित होने का एहसास।
उठ गया था उसके मन में किसी गहराई से यह प्रश्न,
आख़िर कब तक समझौते के सहारे,
वह ढोएगा अपना जीवन।
रोज़-रोज़ नहीं सह सकता अब यह सब,
न जाने कहाँ से आ गयी थी तन-मन में,
एक गजब की ऊर्जा,
आज उसकी ऊर्जा देख,
सर झुकाकर,
चुपचाप बगल से निकल गया था,
वह ताकतवर व्यक्ति।         

Sunday, 12 April 2015

कोई खुश है कोई उदास

कोई खुश है कोई उदास
कोई खुश है,
आज भरपेट खाना मिल गया,
कोई उदास है,
मनपसन्द बिरयानी नहीं मिली।
कोई खुश है,
आज धुले कपड़े पहनने को मिल गए,
कोई उदास है,
सिल्क की नयी साड़ी नहीं खरीद सकी।
कोई खुश है,
आज मुहल्ले के नलके से,
एक बाल्टी पानी ले आई है,
कोई उदास है,
आज अंग्रेज़ी शराब नहीं मिली।
कोई खुश है,
आज बस में सीट मिल गयी,
कोई उदास है,
लेटेस्ट मॉडल की कार नहीं खरीद सका।
कोई खुश है,
आज घर से बाहर निकलने का मौका मिला है,
कोई उदास है,
सालों से घर नहीं जा सका है।
कोई खुश है,
आज बच्चे घर आए हैं,
कोई उदास है,
आज बच्चों ने घर से बाहर कर दिया है।
कोई खुश है,
फटा ही सही पर एक गद्दा मिल गया है सोने को,
कोई उदास है,
शानदार गद्दे और रेशमी चादर पर भी नींद नहीं आती है।
कोई खुश है,
आज पूरे परिवार के बीच एक कंबल मिल गया है ओढ़ने को,
कोई उदास है,
दो रजाइयों के भीतर अकेला ठिठुर रहा है।  
कोई खुश है,
आज माँ ने तिलक लगा कर परीक्षा देने के लिए भेजा,
कोई उदास है,
कभी माँ का मुँह नहीं देखा,जीवन ही परीक्षा बन गयी है।
कोई खुश है,
 आज दीवाली है,
कोई उदास है,
आज दिवाला निकल गया है।
कोई खुश है,
उसके शरीर के सारे अंग सलामत हैं,
कोई उदास है,
शरीर पर धारण करने के लिए आभूषण नहीं हैं।
कोई खुश है,
आज मिठाई खाने को मिली,
कोई उदास है,
कि मधुमेह का शिकार है।
कोई खुश है,
आज बच्चे ने गर्व से सर ऊँचा कर दिया,
कोई उदास है,
कि नालायक पैदा होते ही क्यों नहीं मर गया।
कोई खुश है,
कि घर में बहुत कुछ है,
कोई उदास है,
कि सब कुछ क्यों नहीं है।
कोई खुश है,
आज जान बच गयी,
कोई उदास है,
कि मौत क्यों नहीं आती ?
कोई खुश है कोई उदास है।             

ये प्रेम करने वाले

इन प्रेम करनेवालों को देख
उसे घबराहट होती है।
अपने धर्म से प्रेम करने वाले,
दूसरे धर्मों से करते हैं,
इंतहां की हद तक नफ़रत,
फैलाते हैं सांप्रदायिक हिंसा।
प्रेम से फल,मिठाई,चॉकलेट लेकर,
घर में आनेवाले अपने ही रिश्तेदार,
मौका पा करते हैं,
घर की मासूम बच्ची से बलात्कार।
प्रेम का रोज़ दावा करने वाला प्रेमी,
एक दिन एसिड से नहला देता है प्रेमिका को,
क्योंकि उसने,
उसके प्रेम-प्रस्ताव को,
अस्वीकार करने का दुस्साहस किया था।
प्रेमिका पर दिलोजां लुटाने वाला प्रेमी,
विवाह के बाद,
प्रेमिका के पत्नी बन जाने पर,
बनाता है उसे घरेलू हिंसा का शिकार।
बेटी को हथेली पर रखने वाले,
जी-जान से प्यार करने वाले माता-पिता,
नहीं बर्दाश्त कर पाते,
बेटी का अपनी मर्जी से,
प्रेम या विवाह करना,
इसलिए कर देते हैं,
ऑनर किलिंग।
बहन की खुशी के लिए,
जान लुटाने की कसमें खाने वाले भाई,
ससुराल से प्रताड़ित होकर लौटी बहन को,
समझा-बुझा कर भेज देते हैं ससुराल,
जबकि भली-भाँति जानते हैं कि,
ससुराल वाले हैं दरिंदे।
भाई को राजा भैया कह,
दुलार करने वाली बहन,
संपत्ति के लालच में दे देती है,
उसके नाम की सुपारी।
माता- पिता के रोज़ पाँव छूने वाली संतान,
छोड़ आती है उन्हें,
किसी वीराने स्थल पर,
तीर्थ-यात्रा करवाने के बहाने।
पत्नी को जान कहने वाला पति,
ले लेता है उसकी जान तक,
अगर वह बालकनी में खड़ी होकर,
हंस बोल लेती है,
देवरों से।
करवा चौथ का व्रत कर,
पति की दीर्घायु के लिए पूजा करनेवाली पत्नी,
प्रेमी के साथ मिल,
रचती है पति की हत्या की साजिश।
बच्चों को बड़े प्यार से आँचल में छुपा,
अपना दूध पिला कर बड़ा करनेवाली माँ,
एक दिन दूध में जहर मिला कर,
पिला देती है अपने ही बच्चों को,
क्योंकि उसे अब प्यार हो गया है,
किसी नौजवान से,
ये बच्चे बाधक थे उससे मिलने में।
न जाने,
ऐसे कितने-कितने कारणों से,
ये प्रेम करनेवाले,
प्रस्तुत करते हैं अपने प्रेम का प्रमाण।
बहुत हैरान है वह,

इन प्रेम करनेवालों को देखकर।    

Friday, 10 April 2015

जीवन-पथ


जीवन-पथ पर भटकते
रहे कदम,
जाना कहाँ था,
कहाँ आ गए हम,
अनिश्चित भविष्य,
अस्थिर मन,
उलझनों से भरा हुआ,
ये जीवन।
चाहा बहुत कुछ,
कर सके नहीं हम।
पलकें उनींदी,
बोझिल हो रहीं,
आशंकाएँ सोने नहीं दे रहीं,
सोचते रहे,
जूझते रहे,
कोशिश ही करते रहे हरदम।
फिर भी,
रहे मंजिल से दूर क्यों,
आखिर,
नहीं समझ सके हम।
तनाव से बचना चाहा बहुत,
पर,
न जाने क्यों बच सके नहीं हम।    

Thursday, 2 April 2015

नज़र


मेरी नज़रों की तारीफ़ में,
कहा तुमने,
ये नज़र है पवित्र,
बहुत ही स्वच्छ।
क्या सचमुच है,
मेरी नज़र इतनी साफ,
या तुम्हारी नज़र की ये अच्छाई है,
जिसे मेरी नज़र,

अच्छी नज़र आई है। 

थोड़ी देर की मुलाक़ात


तुम थोड़ी देर के लिए मिले,
और,
अपनी यादें दे गए !
तुम्हें बस ज़रा सा देखा,
और तुम,
अच्छे...
बहुत अच्छे लगे,
अगर तुमसे और बातें होतीं,
या फिर,
बार-बार मिलती,
तो एक-एक करके,
कमियां सामने आतीं,
बहुत अच्छा हुआ कि तुम,
थोड़ी ही देर के लिए मिले,
और,
मेरा ये भ्रम बना ही रहा,
कि तुम अच्छे हो।



Tuesday, 31 March 2015

अभाव


घंटों रोया था वह,
जब नहीं पा सका था,
अपनी पसंद की साइकिल।
पिताजी ने मनाने की,
भरसक कोशिश की थी,
दिलाई थी-
आइसक्रीम, चॉकलेट, लॉलीपॉप
वगैरह......
पर,
नहीं माना था वह,
अपनी ज़िद पर था,
लगातार कायम,
क्योंकि उसके दिल में,
तो बस,
वही साइकिल   
बस गयी थी।
नहीं था उसे कोई सरोकार,
साइकिल की कीमत,
या पिता की आमदनी से।
उसे चाहिए था तो बस,
चाहिए था।
पिताजी मना-मना कर,
चुप हो गए थे,
और वह रो-रो कर।
रोना उसने बेशक,
 बंद कर दिया था,
 पर,
उदास अब भी था।
बड़े होने के साथ,
धीरे-धीरे वह,
समझने लगा था-
पिता की मजबूरियों को,
गरीबी, अभाव और,
इनसे उपजी,
समस्याओं को।
जी-जान से पढ़ने लगा था,
 अब वह,
मन ही मन तय किया –
माता-पिता को,
 दुनियाँ की सारी खुशियाँ,
चाहे वह,
 जहाँ कहीं भी मिलती हों,
लाकर देगा।
पर, उसकी पढ़ाई के,
 बीच में ही,
अचानक..........
 चल  बसे थे पिताजी,
नहीं हो पाया था उसका,
पिता से-
उनके अंतिम क्षणों में,
कोई संवाद।
पता नहीं,
क्या कहना चाह रहे होंगे,
जाते-जाते।
बाद में माँ से पता चला था-
उसे ढूँढा था उन्होंने,
कहा था-
किसी को भेज दो उसके पास,
पर हाँ, मेरी खराब हालत का,
ज़िक्र न करे,
उसकी परीक्षाएं हैं,
बस किसी बहाने,
परीक्षा के बाद उसे,
घर ले आए।
पर, उसके आते-आते,
सचमुच देर हो गयी थी,    
लुट गया था वह,
एकदम से।
मासूम कंधे,
जिम्मेदारियों के बोझ से,
झुके जा रहे थे।
हमेशा के लिए टूट गया था-
रूठने-मनाने का क्रम।
माँ के चेहरे पर,
स्थायी उदासी देख वह,
मन ही मन रोता,
उन्हें हँसाने की कोशिश करता,
 पर वह,
हँसने वाली बात पर भी,
रो पड़तीं थीं।
चुपचाप बैठ जाता था माँ के पास,
कह नहीं पाता था,
शब्दों से कुछ भी,
बाँट लेना चाहता था,
माँ के दुखों को,
और, धीरे-धीरे,
सामान्य होने लगीं थीं माँ,
पढ़ने लगा था वह भी,
नए सिरे से,
खूब मन लगाकर।
पढ़ाई और घर का खर्च जुटाने के लिए,
करने लगा था,
कड़ी मेहनत,
और,
मेहनत रंग लाई,
धीरे-धीरे,
बदली परिस्थितियाँ,
मिट गए अभाव,
पर माँ,
बूढ़ी होतीं चली गईं,
और एक दिन,
वह भी उसे छोड़ गईं।
आज उसके पास हैं,
वो सारी सुख-सुविधाएँ,
जिनके लिए वह कभी,
तरसा करता था,
पर,
दूर जा चुका है वो प्यारा बचपन,
खो गए हैं,

सर-आँखों पर रखनेवाले माता-पिता।