माँ,
समझने लगी हूँ,
क्यों कहती हो
कि मैं तुम्हारी जान हूँ,
लगता है,
तुम्हारे मन के भीतर,
गहरी बहुत गहरी,
असुरक्षा भाव है,
मुझे लेकर।
शाम में
मेरे लौटने पर,
कितना गौर से,
देखती हो मुझे,
कपड़ों की,
एक - एक सिलवट,
लट की,
प्रत्येक उलझन,
गालों की रंगत.....
सिर्फ देखती ही नहीं,
सूंघती भी हो मुझे,
कि मेरे ज़िस्म से,
ठीक वैसी ही,
गंध आ रही है न,
जैसी सुबह,
घर से निकलते वक्त थी,
छू -छू कर तसल्ली करती हो,
कि सब ठीक है न,
तुम्हारे चेहरे के भाव,
शब्दों के,
मोहताज नहीं,
संभल - संभल कर,
बोलती हो।
मेरे और,
दुनिया के बीच की पाट में,
पिसती हो।
क्या मैं जानती नहीं,
तुम्हारा द्वंद्व।
सचमुच....
चाहती तो हो,
मुझे आगे जाने देना,
तो सुनती क्यों हो,
इसकी - उसकी।
डरती क्यों हो?
इससे - उससे।
याद है,
कितनी बार,
दुहराती हो -
तेरी खुशी के लिए,
कुछ भी करूंगी।
फिर!
ये क्यों नहीं करती,
कि
डर और संदेह के,
अंधेरों से,
बाहर निकल आओ।
Thursday, 30 March 2017
ज़िस्म और जान
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Very nicely portrayed...
ReplyDeleteधन्यवाद हेमा रवि।
Deleteधन्यवाद हेमा रवि।
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