बात घूम - फिरकर,
पहुँच ही गयी थी,
उस तक,
जिसके पीछे शुरु हुई थी।
सुनते ही उसे,
झटका - सा लगा था,
हाव - भाव भी,
बदल ही गए थे।
अपमान का बोध,
गहराने लगा था,
आंसू छलछला आये थे।
कंठ में अवरोध सा,
अनुभव हुआ था।
शरीर का संतुलन,
बिगड़ने लगा था।
खुद को सँभालने का प्रयत्न,
असफल सिद्ध हुआ था।
ज़बरदस्ती मुस्कुराने की,
कोशिश में,
हिचकी बँध गयी थी।
मूसलाधार बारिश की तरह,
बहने लगे थे आँसू।
याद आने लगी थीं,
एक - एक कर,
वो मीठी - प्यारी बातें,
जो अक्सर,
उसके सामने हुआ करती थीं।
सामने और पीछे के,
भेद की परत को,
पहचान न पाने का दुःख,
साल रहा था,
वरना बातें तो,
बातें ही थीं,
चाहे मीठी रही हों,
या कड़वी।
Thursday, 30 March 2017
बात की यात्रा
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