गलत को गलत कहना गलत है यहाँ
रोते को हँसाना गलत है यहाँ
सच बोलने की सज़ा तो मिलनी ही थी
रात को रात कहना गलत है यहाँ
समझदारी की बात करते हैं नासमझ
आँखों से पट्टी हटाना गलत है यहाँ
अहंकार का बोझ उठाए फिर रहे
अहं के गुब्बारे को फोड़ना गलत है यहाँ
इंसानियत से वास्ता अब कोई भी नहीं
इंसान को पहचानना गलत है यहाँ
इंतजार से भला क्यों आने लगें लोग
बिभा पलकें बिछाना गलत है यहाँ।
सर्वाधिकार@ बिभा कुमारी
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