कुछ नुकीले दुख
कहने को बात
छोटी सी थी
पर उतनी भी
छोटी कहां थी
बात सिर्फ
बात भर नहीं थी
दुनिया भर के
दुखों की गठरी थी
जिसे वह
अपने सिर
और कंधों पर
लिए फिरती थी
नहीं संभला
फिर खोल दिया
अम्मा के आगे
उन्होंने चुन दिए
कुछ नुकीले दुख
फटक दिए
कुछ हल्के दुख
धो - सुखाकर
दुख को
थोड़ा परिमार्जित
तो कर दिया
पूरी तरह
दूर नहीं कर
पाई
अब वह
लिए फिर
रही है
दुख का
सार तत्व
थोड़ी सी राहत
मिली तो है
थोड़ी अम्मा
की सीख भी
समा गई है
गठरी में
बिटिया दुख
तो रहेगा
हमारा हौसला
भी कौन सा
कम रहेगा
तब से हौसलों
के बल पर
चल रही है
चलती ही
जा रही है।
सर्वाधिकार @बिभा कुमारी
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