Wednesday, 10 June 2026

कुछ नुकीले दुख

 कुछ नुकीले दुख


कहने को बात

छोटी सी थी

पर उतनी भी

छोटी कहां थी

बात सिर्फ

बात भर नहीं थी

दुनिया भर के 

दुखों की गठरी थी

जिसे वह

अपने सिर

और कंधों पर 

लिए फिरती थी

नहीं संभला

फिर खोल दिया 

अम्मा के आगे

उन्होंने चुन दिए

कुछ नुकीले दुख

फटक दिए 

कुछ हल्के दुख

धो - सुखाकर

दुख को

थोड़ा परिमार्जित

तो कर दिया

पूरी तरह

दूर नहीं कर

पाई

अब वह

लिए फिर

रही है 

दुख का 

सार तत्व

थोड़ी सी राहत

मिली तो है

थोड़ी अम्मा 

की सीख भी

समा गई है 

गठरी में

बिटिया दुख

तो रहेगा

हमारा हौसला

भी कौन सा

कम रहेगा

तब से हौसलों

के बल पर 

चल रही है 

चलती ही

जा रही है।


सर्वाधिकार @बिभा कुमारी

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