दिल लगा दीवार से
दीवारों के कान
होते हैं
दिल - दिमाग
बुद्धि - विवेक
नहीं
पर गनीमत
है कि
उनके पास
जुबान नहीं
होती
क्योंकि
जुबान जब
बोलने पर
उतारू होती है
सब पर
हावी हो
जाती है
तो अब
सोचना खुद
ही है कि
दिल की बात
किसके सामने
रखूं?
दीवार के
जो सिर्फ
सुनेगी
या फिर
इंसान के
जो सुनेंगे
आधा - अधूरा
बोलेंगे
नामक - मिर्च
लगाकर
पूरा का पूरा
करेंगे तिल
का ताड़
घूम फिरकर
जब बात
आएगी हम तक
सोचेंगे
- "हमने ऐसा
कब कहा था?"
पर तब भी
सुनेगी
दीवार ही
इंसान तो
बात का
बतंगड़ बनाने
में व्यस्त होंगे।
सर्वाधिकार@बिभा कुमारी
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