दिल, जज्बात और उसूल
मकान को
घर समझने की भूल
इंसान को
सजावटी
दुकान
समझने की भूल
चमक - दमक
के आगे
जज्बातों को
धूल समझने
की भूल
आखिर ये
किस मोड़ पर
भटक रहे हैं
चकाचौंध में
मुहब्बत
ढूंढ रहे हैं
जुबान से
झड़ते हैं
तीक्ष्ण शूल
खरीद कर
पकड़ाते हैं
गुलदस्ते और
फूल
पत्थर पर
छेनी मारकर
मूरत तो बन
सकती है
बाह्य सज्जा से
आकर्षण
भी उत्पन्न
किया जा सकता
पर नहीं डाल सकते
पत्थर के
अणुओं के
मध्य
कोमलता
भला
कैसे उपजाया
जा सकता
उसके भीतर
दिल, जज्बात
और उसूल।
सर्वाधिकार @बिभा कुमारी
No comments:
Post a Comment