सप्पत-किरिया
सप्पत पर केना भरोस करी,
साँच अपनहि अलगि,
हेल जाइछ,
आबि जाइछ उपर,
तर परि जाइछ फूसि,
सप्पत खेनहार,
नहिएं गछैत छथि,
साँच के,
बिसरि जाइत छथि,
अपन बाँचल-खोंचल,
लाज-धाक के,
थथमारि क राखब,
माला जपैत छथि,
फुसिक,
सप्पत-किरिया खा क,
अनकर आँखि में,
गर्दा झोंकब में,
तेहेन क डुमि जाइ छथि,
जे अपने आँखि,
भ जाइत छन्हि बट्टम।
हुनका लगै छन्हि,
लोक हुनके भरोसे,
बैसल छै,
ओ जेना देखौथिन्ह-सुनौथिन्ह,
तहिना सभ,
देखतै-सुनतै,
कहै छै जे......
एहन कत्तौ होई,
आई तक नहिं बनल,
एहन पर्दा वा चद्दरि,
जे झाँपि सकै,
साँच के,
सप्पत-किरिया के,
कोन मोजर?
सर्वाधिकार बिभा कुमारी
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