Thursday, 11 June 2026

दिल लगा दीवार से

 दिल लगा दीवार से


दीवारों के कान 

होते हैं 

दिल - दिमाग

बुद्धि - विवेक

नहीं

पर गनीमत

है कि 

उनके पास 

जुबान नहीं

होती

क्योंकि

जुबान जब

बोलने पर

उतारू होती है 

सब पर

हावी हो

जाती है 

तो अब

सोचना खुद

ही है कि 

दिल की बात

किसके सामने

रखूं?

दीवार के

जो सिर्फ

सुनेगी

या फिर

इंसान के

जो सुनेंगे

आधा - अधूरा

बोलेंगे

नामक - मिर्च

लगाकर

पूरा का पूरा

करेंगे तिल

का ताड़

घूम फिरकर

जब बात

आएगी हम तक

सोचेंगे

- "हमने ऐसा

कब कहा था?"

पर तब भी

सुनेगी

दीवार ही 

इंसान तो

बात का

बतंगड़ बनाने

में व्यस्त होंगे।


सर्वाधिकार@बिभा कुमारी

Wednesday, 10 June 2026

धिया - पुता लादनी

 धिया-पुता लादनी


की कोनो खत्ता-डबरामे

भेटत चूरुक भरि पानि

जाहिमे डुमि क

मरि जाय

हमरा लोकनि

प्रकृति चेतौनी पर चेतौनी

द' रहल अछि

कहि रहल अछि

इह....

मनुक्ख सभ

नहितन

की तोरा

एकसरे टा लेल

केने रही हम

एतेक सरंजाम

करेजी नहि

दलकलौ तोरा सभक

अनानासमे

विस्फोटक द खुएलें

गाभिन हाथिनी

माता केँ

तोहर करनीक

पीड़ा भोगलक

दुनु माय-पूत

ओकर एक

डेगक चांपनमे

कतय जैतौं

हमरा लोकनि

आ कतय

जेइतै

नगरी ठाम

दुस्सह पीड़ा सहि

दम तोरैत

चरितार्थ केलीह-

"छमा बरन को

चाहिए

छोटन को अपराध"

कनैछ पोखरिक

महार

हाकरोश करैछ मेदिनी

एहि महार

पर सँ

जाइत छल

कहियो

दलक-दल हाथी

ओकर भरिगर

डेग सँ

दलमलित होइत

धरतीक थाप पर

नचैत छल

बाल-बृंद

ओह! ओहि

गाभिन माता

ओ भ्रूण हाथीक

छुटैत परान

सँग

नोर बहा रहल

छल

धरती सँ

अकाश धरिक

अणु-परमाणु

कठकरेज मनुक्खटा

अपनहि

दुनियामे

मोन-मतंग

झूमि रहल

छल

हाथियोक

सुरेबगर सुन्नर

उठान सँ बेशी

हमर हृदय क

कोन मे

नुकायल नेना

कनैत अछि

भकर- भकर

गबैत अछि

गर जांति क'-

"हाथी मैया हाथिनी

धिया-पुता लादनी"

ससरी नहि

अलगैछ ओहि

नेनाक जे किछु बाजत

आब

ओकरा सभ सँ बेशी

डर होइत छै

अपनहि प्रजाति सँ

आ कि

दिग-दिगंत

फेरो दमसेइत कहलकै

ईह मनुक्खसभ

नहितन

मोनक कोनमे

नुकायल नेना

मुनि लेलक आँखि

नोरक टघार सँ

भीजि रहल अछि करेजी

गाबि रहल अछि

तरेतर साँसक

बसुली-

"हाथी मैया हाथिनी

धिया-पुता लादनी"

कतय पड़ा जाय

जे नहि किछु

देखय पड़ै

आ नहि सुन'।


सर्वाधिकार@ बिभा कुमारी

दिल, जज्बात और उसूल

 दिल, जज्बात और उसूल


मकान को

घर समझने की भूल

इंसान को

सजावटी

दुकान

समझने की भूल

चमक - दमक 

के आगे

जज्बातों को 

धूल समझने

की भूल

आखिर ये

किस मोड़ पर

भटक रहे हैं 

चकाचौंध में 

मुहब्बत 

ढूंढ रहे हैं 

जुबान से

झड़ते हैं 

तीक्ष्ण शूल

खरीद कर

पकड़ाते हैं 

गुलदस्ते और

फूल

पत्थर पर

छेनी मारकर

मूरत तो बन

सकती है

बाह्य सज्जा से 

आकर्षण

भी उत्पन्न 

किया जा सकता

पर नहीं डाल सकते 

पत्थर के

अणुओं के

मध्य

कोमलता

भला

कैसे उपजाया

जा सकता

उसके भीतर

दिल, जज्बात

और उसूल।


सर्वाधिकार @बिभा कुमारी

कुछ नुकीले दुख

 कुछ नुकीले दुख


कहने को बात

छोटी सी थी

पर उतनी भी

छोटी कहां थी

बात सिर्फ

बात भर नहीं थी

दुनिया भर के 

दुखों की गठरी थी

जिसे वह

अपने सिर

और कंधों पर 

लिए फिरती थी

नहीं संभला

फिर खोल दिया 

अम्मा के आगे

उन्होंने चुन दिए

कुछ नुकीले दुख

फटक दिए 

कुछ हल्के दुख

धो - सुखाकर

दुख को

थोड़ा परिमार्जित

तो कर दिया

पूरी तरह

दूर नहीं कर

पाई

अब वह

लिए फिर

रही है 

दुख का 

सार तत्व

थोड़ी सी राहत

मिली तो है

थोड़ी अम्मा 

की सीख भी

समा गई है 

गठरी में

बिटिया दुख

तो रहेगा

हमारा हौसला

भी कौन सा

कम रहेगा

तब से हौसलों

के बल पर 

चल रही है 

चलती ही

जा रही है।


सर्वाधिकार @बिभा कुमारी

Sunday, 7 June 2026

सप्पत किरिया

 सप्पत-किरिया 

सप्पत पर केना भरोस करी,

साँच अपनहि अलगि,

हेल जाइछ,

आबि जाइछ उपर,

तर परि जाइछ फूसि,

सप्पत खेनहार,

नहिएं गछैत छथि,

साँच के,

बिसरि जाइत छथि,

अपन बाँचल-खोंचल,

लाज-धाक के,

थथमारि क राखब,

माला जपैत छथि,

फुसिक,

सप्पत-किरिया खा क,

अनकर आँखि में,

गर्दा झोंकब में,

तेहेन क डुमि जाइ छथि,

जे अपने आँखि,

भ जाइत छन्हि बट्टम।

हुनका लगै छन्हि,

लोक हुनके भरोसे,

बैसल छै,

ओ जेना देखौथिन्ह-सुनौथिन्ह,

तहिना सभ,

देखतै-सुनतै,

कहै छै जे......

एहन कत्तौ होई,

आई तक नहिं बनल,

एहन पर्दा वा चद्दरि,

जे झाँपि सकै,

साँच के,

सप्पत-किरिया के,

कोन मोजर?


सर्वाधिकार बिभा कुमारी

ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार

 ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार 


नन्ही आँखों ने

अभी तो

देखना शुरू ही किया था

स्वप्नों ने अभी-अभी उनमें

बिछाई थी

सतरंगी चादर

अभी तो

नन्हे कदम

लम्बी यात्रा के लिए

धरती पर

उतरे ही थे

मासूम हँसी

अभी तो

घर से दुनिया तक को रौशन

करने ही वाली थी

अभी तो

नन्ही कली को खिलकर

बनना था फूल

अपनी सुगंध से

महकाना था संसार

अपने तेज से

मिटानी थी

हर बुराई

अफसोस.....

दरिंदगी ने

खोल दिए जबड़े

और लील लिया

निष्पाप बचपन

इंसानियत शर्मसार 

अपनी बेबसी पर

रुदन-क्रंदन

क्षत-विक्षत

तन-मन

टिमटिमाने से पहले ही

टूट गया तारा 


सर्वाधिकार@ बिभा कुमारी

गलत है यहाँ

 गलत को गलत कहना गलत है यहाँ

रोते को हँसाना गलत है यहाँ

सच बोलने की सज़ा तो मिलनी ही थी

रात को रात कहना गलत है यहाँ

समझदारी की बात करते हैं नासमझ

आँखों से पट्टी हटाना गलत है यहाँ

अहंकार का बोझ उठाए फिर रहे

अहं के गुब्बारे को फोड़ना गलत है यहाँ

इंसानियत से वास्ता अब कोई भी नहीं

इंसान को पहचानना गलत है यहाँ

इंतजार से भला क्यों आने लगें लोग

बिभा पलकें बिछाना गलत है यहाँ।


सर्वाधिकार@ बिभा कुमारी

Tuesday, 4 July 2023

भूमिका बदलि क'

 चलू कनि

भूमिका बदलि क

देखल जाय

दर्शक केँ

नर्तक-गायक

प्रदर्शक, वक्ता

आ प्रदर्शक

लोकनिकेँ

के श्रोता-दर्शक

बनाओल जाय

चलू आई

फैंसी कारमे 

पैरे चलनाहर

लोककेँ

बैसाओल जाय

चलू आई

खाली जेबीमे

भरती जेबी

सँ किछु

निकालि क’

राखल जाय

चलू ने आई

कनि भेदभाव

मेटा क’

देखल जाय

चलू ने आई

कनि अन्हार

घर सभमे

दीप लेसल

जाय

चलू आई कनि

भरल खजाना

बिलहि देल जाय

चलू आई कनि

एकरत्ती

इजोरिया

अन्हरिया केँ सेहो

परसल जाय

चलू ने आई

सभटा विभेद

सँ उठि क’

अगबे मनुक्ख केँ

देखल जाय।



Monday, 3 July 2023

दू रंगक लोक

 दू रंगक लोक 


मोटामोटी दू रंगक

लोक देखलौं

लिबनाहर आ लिबोउनहार

टहलुक आ अरहौनहार

बौक आ बजनिहार

कोरिया कातर

आ बिलहौनिहार

सेवा केनहार

आ करौनिहार

भितरघुन्ना आ कि फंचार


उसठ दुनिया

 उसठ दुनिया


झमा क’ खसल विचार

फाटि क’

ओदरि गेल विवेक

लोकमे सँ जेना

लोके हेरा गेल

बरु दूधमे सँ

नेन बिला गेल

कुसियार सँ

बहरा गेल

मिट्ठ रस

मिरचाई सँ

चोरा लेलक क्यो

सुरसुरी

मर! ई दुनिया

एतेक उसठ आ

अनोन किएक

भ’ गेलै।



रीढ़क हड्डी


रीढ़क हड्डी

जहन रीढ़क हड्डीए 
तोड़ि लेब
त कुर्सी 
लइए क’
की करब
सोझ भ’ बैसल त’
हैत नहि
भलहुक
धब सिन
कुर्सी पर
खसि पडब अनेरे
गोबरक
चोत जेकाँ।

काछुए रहितौं ने

 काछुए रहितौं ने


खोलेमे रहबाक छल

त काछुए रहितौंने

ज मुड़ी बालुएमे 

ढुकौन रखबाक’

छल त’

शुतुरमुरगे होइतौं ने

ज सीखबाक छल

ड्सनाइए त’

गहुमने होइतौं ने

ज बिन्हब अपन

प्रकृति बनेबाक छल

त बिरह्निए हेबाक

छल ने

ज दूरि करबाक

छल अनकर

परसल थारी त’

गन्हकिए होइतौं ने

ज हेबाके अछि किछु

त किएक नहि भ’जाइ

गबैत कोयली, उमकैत नदी

घनगर वृक्ष वा

गमकैत फूल।






बिसरि जाइ छी

हमरा लोकनि

अपन कर्तव्य

मोन रहि जाइत

अछि छूछे 

अधिकार किए?

किए बिसरा जाइत

अछि अनेरे

अपन मनुक्ख

भेनाई?



Sunday, 2 July 2023

मनुक्खक इंद्रजाल

 बाघक चांगुर मे

हरिण वा लोक

एक्के रंग

नचार

ओतय कहाँ छै

बचबाक लेल

कोनो उपचार

बिलाइक

चांगुरमे मूस

कनिकबे कालमे

अपन अंत जानि

गोहराबय लागल

अछि अपन

देवता पितर

ताहि सँ कि

बिलाइक हृदयमे

मात्सर्य उमड़ि

जाइछ?

बिलाई मूसक

देहक सभटा

मासु खा क’

ओकर रोइयाँ सँ छारल चाम

कोठीक गोरा तरमे

छोड़ि दोसर

मूसकेँ पकड़बाक लेल

धपायल रहैत छै

मनुक्खे निर्माण

केने छलै

बेर-बेगरताक

चीज-बौस केर

बिक्री-विनिमय

लेल बजारक

मुदा की द’क’

की लेबाक छल

तेकर अवगति

नहि रहलै

ओ त’ जानिए

नहि सकलै

जे कखन ओ

अपनहि

बाजार लेल

एकटा साधन

बनि क’

रहि गेलै

बजार एक्के

बेरमे हजारक

हजार लोककेँ चांगुरमे

झपटि क’

तरहत्थी पर

तमाकुल जेकाँ

चुना क’

कल्ला तर

दाबिक चलि

देलक अछि

फेर सँ

नव-नव

शिकारकेँ

फुसला-पोलहा क

ओकर शोणित

पीबाक लेल

मनुक्ख लेल

प्रकृति देने छलै

सभ किछु

धरि मनुक्ख केँ

संतोख कहाँ

अपन विकासक

नाम पर

कटैत रहल

ओहि गाछक

जड़ि जकर

टिकासन पर

ओकर चास बास छलै

मनुक्ख अपने

बनाओल

इंद्रजालमे

ओझरा क

औना रहल छै।


दुत्कारे जाने का दर्द

 दुत्कारे जाने का दर्द

सहा जाना

कठिन था

तो उसने 

पलटकर

दर्द को ही

दुतकारा था

दर्द ने उसे

दोनों हथेलियों पर

उठा लिया

वह उपेक्षा से

घबराई थी

पर उसकी मार ने

उसे कंधों

पर बैठाकर

उसकी दृष्टि को

दूर तक

स्पष्ट कर दिया

वह अपमान से

टूटी थी

पर अपमान ने

उसे समझाया

दूसरों की

गलती में भला

तुम्हारा क्या दोष

वह चोट खाकर

तिलमिलाई थी

पर चोट धीरे-धीरे

उसका पथ-प्रदर्शक

बन गया


नेना और मम्मी

 नेना और मम्मी


आपको गर्भमें 

धारण कर,

पढ़ रही थी मैं…

किताबें

लिख रही थी 

लेख और डेज़रटेशन

फिर

दोनों हथेलियों में

आपको थाम 

आपका

चेहरा पढ़ने लगी

लिखने लगी

लोरियां

जो मेरे होठों पर

आतीं कि

कण्ठ सुरीली

तान उठाने लगती

आपके 

नन्हें गुलाबी होंठ

मुस्कुराते से 

शब्दों को पकड़ने

को आतुर 

कि क्षणांश में

रोनी सूरत

बना लेते आप

आपकी दादी

कहती थीं 

हर बच्चा

ऐसे ही रोता-हँसता है

इस वक्त वह

भगवान से बातें

करता है

आपकी नानी

कहतीं-

मेरी अल्हड़ बेटी 

शिशु पकड़ना भी

नहीं आता

ऐसे लिए आ रही है

बाबू को

जैसे आरती की थाली

धीरे-धीरे

खेल-खेलमें

बदलने लगे हम

भूमिकाएँ

आप मम्मी

और मैं नेना बन

पू-झा और

लुका-छिपी

खूब खेलने लगे

बैठना भी

सीख गए आप

किताबों के बीच

पूछ-पूछकर

अक्षर भी

पहचानने लगे

तबसे तो अपना 

लिखने-पढ़ने

सीखने-सिखाने

का दिलचस्प क्रम

चल निकला

मैं ने आपको

अक्षर सिखाया 

और आपने मुझे

कम्प्यूटर ऑन

करने से 

टाइपिंग तक

आपने

इसी तिथि को

दिया था मुझे

माँ बनने का गौरव

मुझे नहीं पता

मैं अच्छी

माँ बन पाई 

कि नहीं

पर आप

बहुत अच्छे

बच्चे हो

खरे सोने से लोचदार

सच्चे हीरे से

चमकदार

और स्वच्छ जल

की तरह पारदर्शी।








व्यापार करने लगे हैं

 लोग पहले प्यार

करते थे

अब व्यापार

करने लगे हैं

व्यापार का होता

एक ही उसूल

मुनाफा आता रहे

बना रहे मूल

लाभ के लिए अब

एक का दो

दो का चार करने

लगे हैं

व्यापार में

एक एक मिनट

कीमती है

सामान के साथ

बोतल डब्बा भी

कीमती है

लाभ के लिए लोग

बातें घुमावदार करने लगे हैं


सूनि लिय

Friday, 30 June 2023

अक्सर

 अक्सर बड़ी जगहों पर छोटी

और छोटी जगहों पर

बड़ी सोच वाले लोग मिले

अक्सर बड़े मकानों में पुतले

और झोंपड़ियों में इंसान मिले

अक्सर अपनों से उपेक्षा

अनजानों से अपेक्षा मिली

अक्सर पैसेवाले स्वार्थी और

खाली जेबवाले उदार मिले

अक्सर प्यार का दावा करने वाले फरेबी

प्यार छुपाने वाले प्रेमी निकले

अक्सर जिनसे उम्मीदें थीं उनसे धोखा

जिनसे नहीं थीं उनसे प्यार भरी सौगात मिली

अक्सर हँसते रहने वाले वास्तव में दुखी

और रोते रहने वाले भीतर से खुश निकले।

अक्सर बुढ़ापे में सच्चे प्रेम को परवान चढ़ते

और जवानी में झूठे वायदों को

सजते देखा गया

अक्सर डॉक्टर मरीज से ज्यादा

घायल पाया गया

अक्सर दवा से ज्यादा दुआ

काम आई

अक्सर वारदात को

दिन दहाड़े अंजाम दिया गया

अक्सर दावतों से लोग भूखे लौटे

अक्सर बचे हुए भोजन ने अतिथियों को तृप्त किया।


आदत

 आदत

चुप रहने की

आदत ने उसे

सिंहासन तक

पहुँचा दिया

बोल पड़ने की

आदत ने मुझे

बेघर कर दिया।


Thursday, 23 March 2023

जीवन एक लंबी कविता

 जीवन एक लम्बी कविता


जब …

मेरी

अनदेखी होती है

मैं

काम की

गति और

गुणवत्ता बढ़ाने

के लिए

दिन-रात

एक कर देती हूँ

जब..

प्रशंसा

होती है

मैं कानों को

बंद कर लेती हूँ

जब..

निंदा होती है

मैं त्रुटि-सुधार

के लिए

साधना करती हूँ

जब…

मेरे या 

किसी अन्य के साथ

अन्याय होता है

मैं और

प्रतिबद्ध हो

उठती हूँ

न्याय के प्रति

जब...

मेरी तरफ

बढ़ता है

मित्रता का हाथ

मैं उसे

चहककर

थाम लेती हूँ

जब...

मिलता है प्रेम

भावविभोर

हो जाती हूँ

जब...

मुझपर भरोसा

किया जाता है

मैं नतमस्तक

होकर

विनम्रता

और जिम्मेदारी

के भाव से

भर जाती हूँ

एक कवि

होने का

कर्तव्य

निभाऊंगी मैं

अपनी आखिरी

साँस तक

इस जीवन

को मैं

एक लम्बी कविता

की तरह

पढ़ने-समझने

का प्रयत्न

करती हूँ

कभी नहीं

ऊबता मेरा मन

इसमें डूबने से

क्योंकि कविता

की व्याख्या

अनन्त होती है।